शेख अब्दुल्ला से लेकर उमर अब्दुल्ला तक: जानिए कैसे एक परिवार की सियासत ने कश्मीर का इतिहास बदल दिया। 1930 से 2025 तक, POK विवाद से लेकर 1987 की चुनावी धांधली का पूरा सच।

कश्मीर के इतिहास के दो दिग्गज: शेख अब्दुल्ला और पंडित जवाहरलाल नेहरू। इनके बीच के उतार-चढ़ाव भरे रिश्तों ने दशकों तक जम्मू-कश्मीर की राजनीति की दिशा तय की।
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लेखक: Kartik Kumar

अंतिम अपडेट: 26 दिसंबर, 2025

पढ़ने का समय: 5-6 मिनट

जम्मू-कश्मीर की राजनीति में जब भी किसी एक परिवार के वर्चस्व की बात आती है, तो 'अब्दुल्ला खानदान' का नाम सबसे ऊपर होता है। 1930 के दशक से शुरू हुई यह राजनीतिक विरासत आज भी विवादों के केंद्र में है। हाल ही में फारूक अब्दुल्ला द्वारा POK (पाक अधिकृत कश्मीर) को लेकर दिए गए बयानों ने एक बार फिर उनके परिवार के इतिहास, उनकी निष्ठा और 'कश्मीरी कार्ड' की राजनीति पर एक नई बहस छेड़ दी है।

1. मुस्लिम कॉन्फ्रेंस से नेशनल कॉन्फ्रेंस तक का सफर (1930-1947)

सन 1930 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) से पढ़कर लौटे शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ने महाराजा हरी सिंह के खिलाफ मोर्चा खोला। उन्होंने 1932 में 'ऑल जम्मू एंड कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस' की नींव रखी। हालांकि, तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों और जवाहरलाल नेहरू के प्रभाव में आकर 1939 में इसका नाम बदलकर 'नेशनल कॉन्फ्रेंस' कर दिया गया ताकि इसे एक धर्मनिरपेक्ष चेहरा दिया जा सके।

Source: शेख अब्दुल्ला की आत्मकथा 'आतिश-ए-चिनार' और The Hindu आर्काइव्स।


कश्मीर की सियासत का वो निर्णायक मोड़, जब 1953 में प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला को गिरफ्तार किया गया। सत्ता के गलियारों में मची इस हलचल ने घाटी के भविष्य की इबारत बदल दी।
1953 में प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला गिरफ्तार (AI Photo)

2. 1953 की गिरफ्तारी: 'स्वतंत्र कश्मीर' का सपना और नेहरू से दरार

आजादी के बाद नेहरू ने शेख अब्दुल्ला को कश्मीर का प्रधानमंत्री बनाया। लेकिन जल्द ही शेख के 'स्वतंत्र कश्मीर' के सपनों ने दिल्ली की चिंता बढ़ा दी।

इन-डेप्थ विश्लेषण: 1953 में अमेरिकी राजनायिक एडलाई स्टीवेन्सन ने श्रीनगर में शेख से मुलाकात की थी। आईबी (IB) की रिपोर्ट के अनुसार, इस बैठक में 'स्वतंत्र कश्मीर' का खाका खींचा गया था। नेहरू ने जब स्पष्टीकरण मांगा, तो शेख ने मिलने से मना कर दिया। अंततः सरदार पटेल की पुरानी चेतावनियों को याद करते हुए नेहरू ने 9 अगस्त 1953 को उन्हें बर्खास्त कर जेल भेज दिया। इसे 'कश्मीर षड्यंत्र केस' के नाम से जाना गया।


कश्मीर की सियासत का वो निर्णायक मोड़, जब 1953 में प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला को गिरफ्तार किया गया। सत्ता के गलियारों में मची इस हलचल ने घाटी के भविष्य की इबारत बदल दी।
1987 के कश्मीर चुनाव, 'कलम' की जगह 'बंदूक'(AI Photo)

3. 1987 का चुनाव: जहाँ से बंदूक ने कलम की जगह ली

इतिहासकार और राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि 1987 के विधानसभा चुनावों में फारूक अब्दुल्ला और राजीव गांधी के गठबंधन ने सत्ता हथियाने के लिए भारी धांधली की। इस धांधली ने घाटी के युवाओं का भारतीय लोकतंत्र से भरोसा उठा दिया।

विशेषज्ञ की राय: "कश्मीर की राजनीति में 1987 का चुनाव वह 'वाटरशेड मोमेंट' था जिसने बंदूक को पेन पर हावी कर दिया। फारूक अब्दुल्ला की सत्ता की भूख ने उन युवाओं को आतंकी बना दिया जो कभी लोकतंत्र का हिस्सा बनना चाहते थे।" — तवलीन सिंह, वरिष्ठ पत्रकार (Kashmir: A Tragedy of Errors).


अपनों का साथ और पुश्तैनी घर छोड़ने का वो अंतहीन दर्द। 1990 के उस दौर की एक हृदयविदारक झलक, जब हजारों कश्मीरी पंडितों को अपनी ही ज़मीन से विस्थापित होना पड़ा।
कश्मीरी पंडितों का पलायन (1990)(AI Photo)

4. 1990 का पलायन: जब रक्षक ही मैदान छोड़ गया

19 जनवरी 1990 को कश्मीर के इतिहास का सबसे काला दिन माना जाता है। जब मस्जिदों से कश्मीरी पंडितों के खिलाफ "रलिब, चलिब या गलिब" (धर्म बदलो, भागो या मरो) के नारे लग रहे थे, तब मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने जिम्मेदारी संभालने के बजाय इस्तीफा दिया और लंदन चले गए।

फैक्ट बॉक्स (शेख का दोहरा चेहरा): पूर्व राज्यपाल जगमोहन ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि शेख अब्दुल्ला दिल्ली में सेकुलरिज़्म की बात करते थे, लेकिन श्रीनगर की मस्जिदों में मजहबी भावनाओं को भड़काते थे। यही 'दोहरी राजनीति' फारूक और उमर के दौर में भी जारी रही।


5. पारिवारिक विरोधाभास: राजनीति मजहब की, जीवन आधुनिक

अब्दुल्ला परिवार एक तरफ कश्मीरी पहचान और मजहब की दुहाई देता रहा, वहीं उनके निजी जीवन के फैसले हमेशा इससे अलग रहे:

  • शेख अब्दुल्ला: यूरोपियन मूल की बेगम ज़ैनब (Nedous Family) से निकाह।
  • फारूक अब्दुल्ला: ब्रिटिश नर्स मौली से शादी।
  • उमर अब्दुल्ला: पायल नाथ (हिंदू) से शादी।
  • सारा अब्दुल्ला: सचिन पायलट (हिंदू) से शादी।

विश्लेषकों का मानना है कि यह विरोधाभास दर्शाता है कि आम कश्मीरी को 'मजहब' के नाम पर उलझाकर इस परिवार ने खुद को हमेशा वैश्विक और सुरक्षित रखा।

6. 2019 के बाद का नया कश्मीर: क्या अब्दुल्ला परिवार अब अप्रासंगिक है?

5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 हटने के बाद इस खानदान की राजनीति की नींव हिल गई है। आज जब कश्मीर में पत्थरबाजी बंद हो गई है और रिकॉर्ड पर्यटन हो रहा है, तब फारूक अब्दुल्ला का POK पर पाकिस्तान का पक्ष लेना उनकी गिरती राजनीतिक साख को बचाने की एक कोशिश मानी जा रही है।

निष्कर्ष: अब्दुल्ला परिवार का इतिहास सत्ता के खेल और विवादास्पद फैसलों से भरा है। आज का युवा कश्मीर अब विकास की मुख्यधारा से जुड़ना चाहता है। ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि क्या अब कश्मीर इस 'वंशवादी राजनीति' से आगे बढ़ने को तैयार है?


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

  1. क्या 1987 के चुनाव में धांधली हुई थी? हाँ, अधिकांश ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स और विश्लेषक इसकी पुष्टि करते हैं।
  2. शेख अब्दुल्ला को कितनी सजा हुई? उन्हें करीब 11 साल जेल और नजरबंदी में बिताने पड़े।
  3. POK पर आधिकारिक स्टैंड क्या है? 1994 के संसदीय प्रस्ताव के अनुसार POK भारत का अभिन्न अंग है।

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